Wednesday, 13 March 2013

आंखों के लिए योगासन

योग के लाभ से सभी परिचित हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं स्वस्थ आंखों के लिए भी आप कुछ आसन योगासनों का सहारा ले सकते हैं।
 
आंखों के योग अपनाकर आजीवन अपनी दृष्टि को मजबूत बना सकते हैं। निश्चित अंतराल के बाद आंखों की रोशनी अपने-आप कम हो जाती है। आंखों के आसपास की मांपेसियां अपने लचीलेपन को समाप्त कर देती हैं और कठोर हो जाती हैं। लेकिन अगर आखों के आस-पास की मांसपेशियां मजबूत हों तो आंखों की रोशनी बढती है। आंखों और दिमाग के बीच एक गहरा संबंध होता है। दिमाग की 40 प्रतिशत क्षमता आंखों की रोशनी पर निर्भर होती है। जब हम अपनी आंखों को बंद करते हैं तो दिमाग को अपने-आप आराम मिलता है। दुनिया की कुल आबादी की 35 प्रतिशत जनसंख्या निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) और दूरदृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) से ग्रस्त है जिसकी वजह से लोग मोटे-मोटे चश्मों का प्रयोग करते हैं। लेकिन चश्मे का प्रयोग करके आंखों की रोशनी को बढाया नहीं जा सकता है। योगा करके आंखों की रोशनी को कायम रखा जा सकता है।
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काम के दौरान कुछ बातों का ख्याल रखें :
गर्दन को सीधा रखकर आंखों की पुतलियों को पहले 4-6 बार ऊपर नीचे और फिर दाएं-बाएं घुमाएं। उसके पश्चात 4-6 बार दाएं-बाएं गोलाई में क्लॉकवाइज और एंटी-क्लॉकवाइज घुमाइए।
आखों को घुमाते वक्त हथेलियों के मध्य भाग से आंखों को कुछ देर तक ढंककर रखें, इससे आंखों की मांसपेशियां मजबूत बनी रहेंगी।
कंप्यूटर पर काम करते वक्त हर 10 मिनट बाद कम से कम 20 फुट दूर जरूर देखें, इससे दूर दृष्टि बनी रहेगी।
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आंखों के लिए कुछ योगा
सर्वांगासन :
इस क्रिया को करने के लिए सबसे पहले शवासन में लेट जाइए, दोनों हाथों को जांघों की बगल में तथा हथेलियों को जमीन पर रखें। पैरों को घुटनों से मोडकर ऊपर उठाइए तथा पीठ को कंधों तक उठाइए। दोनों हाथ कमर के नीचे रखकर शरीर के उठे हुए भाग को सहारा दीजिए इस तरह ठुड्डी को छाती से लगाए रखें। अब सांस को रोके नहीं। अब पैरों को घुटनों से मोडते हुए वापस माथे के पास ले आइए। अब हाथों को जमीन पर रखते हुए शरीर और पैरों को धीरे-धीरे शवासन में लाइए। आसन करते समय आंखों को खुला रखें। इस आसन को करने से आंखों की रोशनी तेजी से बढती है। क्रोध और चिडचिडापन भी समाप्त होता है। बच्चों के दिमाग के लिए यह आसन बहुत उपयोगी है।
शवासन :
इस आसन को करने के लिए सहज और शांत मन से पीठ के बल लेट जाइए। पैरों को ढीला छोडकर भुजाओं को शरीर से सटाकर बगल में रख लिजिए। शरीर को पूरी तरह से फर्श पर स्थिर हो जाने दीजिए। इस आसन को करने से शरीर की थकान और दबाव कम हो जाएगी। सांस और नाडी की गति सामान्य हो जाएगी। आंखों को आराम मिलता है और रोशनी बढती है।
प्राणायाम :
प्राणायाम पद्मासन और सिद्धासन की मुद्रा में बैठकर किया जाता है। प्राणायम शारीरि‍क और मानसिक दोनों प्रकार की साधनाओं में किया जा सकता है। प्राणायाम करने से दिमाग स्थिर रहता है और आंखों की रोशनी बनी रहती है। प्राणायाम से शरीर और मन दोनों स्‍वस्‍थ्‍य रहते हैं।
कई लोग जो कंप्यूटर पर लगातार 8-10 घंटे काम करते वक्त आंखे गडाए रहते हैं उनकी आखों पर नुकसान पहुंचता है। आंखों को आराम देने के लिए केवल नींद लेना ही पर्याप्त नहीं होता है। आंखों में कमजोरी आने की वजह से स्मृति दोष और चिडचिडापन की समस्या आम हो जाती है जिसके लिए आंखों का योगा बहुत जरूरी है।
योग में छिपा हेल्दी स्किन का राज

खूबसूरती किसे नहीं अच्छीस लगती और आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास अपनी खूबसूरती बरकरार रखने के लिए ब्यूछटी पार्लर का सहारा लेने के अलावा कोई और विकल्प  नहीं। लेकिन योग ऐसा साधन है जिसे अपनाकर आप खूबसूरत दिखने के साथ-साथ स्व्स्थल भी रह सकते हैं। रिंकल्स  और डार्क सर्कल्सप जैसी समस्याओं से छुटकारा पाना है, तो योग अपनायें।

झुर्रियों से छुटकारा:
सुबह योग करें और योग के दौरान मुंह से लंबी सांस खींचें, एक मिनट के लिए रूकें और फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ें। कुछ दिनों तक पांच बार ऐसा करके देखें।

आंखों के लिए:
अपने हाथों के बीच की तीन उंगलियों को आंखों के नीचे रखें और बिना किसी प्रकार का दबाव दिये इनसे आंखों को नीचे की ओर खींचे। यह व्याचयाम आंखों के नीचे होने वाली सूजन व झुर्रियां दूर करता है और आंखों की परेशानियों को भी दूर कर आंखों को आराम देता है।

फील गुड:
किसी भी प्रकार के व्यायाम का लाभ तबतक नहीं मिलता, जब तक कि आप अच्छां महसूस ना करें। अच्छाह दिखने के लिए सकारात्मकक सोच अपनायें और सुखासन और श्वाहसन जैसे व्यारयाम अपनायें। ऐसा करके आप तनावमुक्तो हो सकेंगे। 

ध्यारन:
ध्यारन आपको मानसिक तौर पर आराम देगा, अपनी खूबसूरती लंबे समय तक बरकरार करने के लिए रोज़ाना 10 से 15 मिनट तक ध्याअन करें।  

दमकती त्वजचा के लिए:
योग से हमारे शरीर में मौजूद टाक्सि न निकल जाते हैं और त्वबचा में चमक आती है। चेहरे को हथेलियों से ढककर 10 बार तेज़-तेज़ गहरी सांस लें।  

तनाव रखें दूर 
तनाव के कारण रक्त  का सर्कुलेशन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता और इसका प्रभाव चेहरे की मांस-पेशियों पर भी पड़ता है। समय से पहले बालों का सफेद होना भी तनाव के कारण होता है, तो तनाव को खुद से दूर रखें।

Sunday, 10 March 2013


बेलपत्र से ही खुश हो जाते हैं भोले

यह संसार संतुलन पर टिका है. अगर पृथ्वी हमें रहने के लिए स्थान प्रदान करती हैं तो नभ जीवन का अनमोल तत्व जल प्रदान करते हैं. संतुलन का यह नियम हमारे देवताओं पर भी लागू होता है. अगर भगवान विष्णु पालनकर्ता हैं तो भगवान शिव को लोग विनाश का देवता मानते हैं. सृष्टि के सृजन में यह संतुलन बेहद अहम है. धर्म-शास्त्रों में मान्यता रखने वाले लोगों का मानना है कि सृष्टि के इसी संतुलन को बनाए रखने में सबसे अहम योगदान है भगवान शिव का.

शिव ईश्वर का एक रूप हैं. हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक त्रिदेव हैं, इनमें से महेश को ही भगवान शिव के नाम से जाना जाता है. भगवान शिव को यूं तो प्रलय का देवता और काफी गुस्से वाला देव माना जाता है. लेकिन जिस तरह से नारियल बाहर से बेहद सख्त और अंदर से बेहद कोमल होता है उसी तरह शिव शंकर भी प्रलय के देवता के साथ भोले नाथ भी है. वह थोड़ी सी भक्ति से भी बहुत खुश हो जाते हैं और यही वजह है कि शिव सुर और असुर दोनों के लिए समान रूप से पूज्यनीय हैं.

शिव का अर्थ
शिव का अर्थ है कल्याण, शिव सबका कल्याण करने वाले हैं. महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है. शिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन का महापर्व है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था.
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महाशिवरात्रि
भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए सोमवार का दिन अहम माना जाता है लेकिन भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए महाशिवरात्रि का दिन विशेष होता है. महाशिवरात्रि फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी को मनाया जाता है. इस वर्ष शिवरात्रि 10 मार्च को है. महाशिवरात्रि संपूर्ण विश्व में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

महाशिवरात्रि का महत्व:
शिवपुराण में वर्णित है कि शिवजी के निष्कल (निराकार) स्वरूप का प्रतीक ‘लिंग’ इसी पावन तिथि की महानिशा में प्रकट होकर सर्वप्रथम ब्रह्मा और विष्णु के द्वारा पूजित हुआ था. इसी कारण यह तिथि ‘शिवरात्रि’ के नाम से विख्यात हो गई. यह दिन माता पार्वती और शिवजी के ब्याह की तिथि के रूप में भी पूजा जाता है.

माना जाता है जो भक्त शिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेंद्रीय होकर अपनी पूर्ण शक्ति व साम‌र्थ्य द्वारा निश्चल भाव से शिवजी की यथोचित पूजा करता है, वह वर्ष पर्यंत शिव-पूजन करने का संपूर्ण फल मात्र शिवरात्रि को तत्काल प्राप्त कर लेता है.

भगवान शिव का महत्व:
कई लोग पूछते हैं कि भगवान शिव जब प्रलंयकारी हैं तो उनकी पूजा क्यूं होती है? इसका जवाब है खुद शिव. अगर धर्म-शास्त्रों की बातों को सही मानें तो यह सिद्ध होता है कि जब-जब सृष्टि पर विनाशलीला हुई है तब-तब भगवान शिव ने अपने तेज से इसे बचाया है. समुद्र मंथन के समय निकले अमृत को ग्रहण करने लिए तो सभी देवताओं में होड़ लगी थी लेकिन जब समुद्र मंथन से विष बाहर आया तब भगवान शिव ही वह देवता थे जिन्होंने विष को ग्रहण कर सृष्टि को हलाहल से बचाया.

धर्म-शास्त्रों में हर देवता की पूजा करने के बड़े-बड़े विधान और उनके लिए 56 भोगों की व्यवस्था की गई है लेकिन अगर आप भगवान शिव की पूजा के बारे में शोध करेंगे तो पाएंगे कि भगवान शिव तो मात्र बेल-पत्र और जल से ही खुश हो जाते हैं. जंगल में मिलने वाले विषैले और नशीले धतूरे और बेहद सुगम प्राप्त होने वाले बेर से ही भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने भक्तों को वरदान और खुशी देते हैं.

भगवान शिव – एक संपूर्ण देव
भगवान शिव को एक संपूर्ण देवता माना जाता है. सांसारिक इच्छाओं और परेशानियों को एक साथ लेकर चलते हुए उन्होंने अपनी गृहस्थी भी बसाई. एक आदर्श इंसान को किस तरह समाज के साथ अपने परिवार को लेकर चलना चाहिए यह शिव के जीवन चरित्र से सीखने को मिलता है. नर, मुनि और असुरों के साथ बारात लेकर शिव माता पार्वती से विवाह के लिए गए थे. शिव की नजर में अच्छे और बुरे दोनों ही तरह के लोगों का समान स्थान है. वह उनसे भी प्रेम करते हैं जिन्हें यह समाज ठुकरा देता है. शिवरात्रि को भगवान शिव पर जो बेल और भांग चढ़ाई जाती है यह शिव की एकसम भावना को ही प्रदर्शित करती है. शिव का यह संदेश है कि मैं उनके साथ भी हूं जो सभ्य समाजों द्वारा त्याग दिए जाते हैं. जो मुझे समर्पित हो जाता है, मैं उसका हो जाता हूं. उपरोक्त सभी बातें यह दर्शाती हैं कि भगवान शिव की नजर में सभी प्राणी एक हैं.

कई बौद्धिक ज्ञानी मानते हैं कि भगवान शिव को सिर्फ भगवान मान पूजने से उनकी भक्ति पूरी नहीं होती बल्कि उनके आदर्शों और नियमों को जीवन में उतारने से ही शिव की पूजा पूरी होती है. समाज के कल्याण के लिए जहर पाने के लिए भी तैयार रहना, जितने है उतने में खुश रहना, किसी को छोटा-बड़ा ना मानना यही भगवान शिव के आदर्श और मूल्य हैं. आशा करते हैं शिवरात्रि के इस पावन अवसर पर श्रद्धालु और भक्तगण सिर्फ भगवान शिव की पूजा ही ना करें बल्कि उनके चरित्र और कर्मों का ध्यान करें और जीवन में उन्हें उतारने का प्रयास करें.

भुबनसिह रावत (उत्तराखन्ड)
फोकल पाइँट लुधियाना
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सबला बनने के लिए खुद जागना होगा नारी को



अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च  पर सभी को बधाई .समाज की धुरी नारी अपनी शक्तियों को पहिचाने ,अपना महत्व समझे और आगे बढे ऐसी शुभकामनाएं
राजनीति,,वैधानिक , शैक्षणिक ,न्यायिक,प्रशासनिक ,आर्थिक ,सैन्य,उड्डयन ,निर्माण,अनुसंधान ,सेवा ,चिकित्सा  …………….सभी क्षेत्रों में नारी की उपलब्धियां आज  शिखर को चूम रही हैं.नारी स्वयम को गौरवान्वित अनुभव करती है,ईर्ष्या को भी जन्म दे रही हैं,पद,वेतन,अन्य सुविधाओं में नारी पुरुष को चुनौती दे रही है.राष्ट्राध्यक्ष,राज्याध्यक्ष ,कला, साहित्य कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं दिखता ,जहाँ नारी पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाने में पीछे हो. ये तो अन्तराष्ट्रीय स्तर पर नारी की स्थिति है.(जो एक विशद विषय है ),भारतीय नारी की स्थिति पर विचार करते हुए ………………

ऐतिहासक और पौराणिक परिप्रेक्ष्य में तो  हमारा देश “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते………. ” के सिद्धांत में विश्वास करने वाला देश ,विदुषी नारियों को शास्त्रार्थ का अधिकार प्रदान करने वाला देश अपने देश की रक्षार्थ अपने पुत्र का बलिदान करने वाली,नारियों का देश ,पुरुष से पूर्व नारी को सम्मानित स्थान प्रदान करने वाला रहा ही है,,”सीता राम”,राधाकृष्ण,उमापति महादेव,लक्ष्मीपति विष्णु के नाम से पुकारे जाने वाले शिव-विष्णु के इस देश में, यज्ञ में पत्नी की उपस्थिति को सदा  अपरिहार्य माना गया है ,पति का कोई भी अनुष्ठान पत्नी के बिना अपूर्ण ही माना गया है. सशस्त्र युद्ध में भाग लेते हुए पति के प्राणों की रक्षा करने के उदाहरण हमारे इतिहास में विद्यमान हैं.स्वयम सेना का नेतृत्व करते हुए दुश्मन को नाको चने चबबाने  के उद्धरण से भारतीय इतिहास के पन्ने सजे हैं.
स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं ऩे बढचढ का भाग लिया.कुलीन परिवारों की या आम परिवारों की ,सभी की भागीदारी इस यज्ञ में रही. रानी लक्ष्मीबाई,एनी विसेंट,भगिनी निवेदिता,बेगम हज़रत महल ,सरोजिनी नायडू,दुर्गा भाभी आदि महान विभूतियों ऩे तन-मन धन देश के लिए समर्पित किया.,,स्वदेश में ही नहीं विदेश जाकर भी मैडम कामा सदृश वीरांगनाओं ऩे अपना योगदान दिया.(ये नाम तो उन महान महिलाओं के हैं,इनके अतिरिक्त जिन्होंने परिवार का भार अपने कन्धों पर सम्भालकर अपने पति ,पुत्र,भाई सभी को स्वाधीनता के पुनीत यज्ञ में आहुति देने को प्रेरित किया वो तो असंख्य हैं.)
आधुनिक समय में भी राष्ट्राध्यक्ष,प्रधानमंत्री  देश को पर्दे के पीछे से चलाने वाली कांग्रेस अध्यक्षा,मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष,प्रमुख न्यायाधीश,सैन्यधिकारी,सर्वोच्च पुलिस अधिकारी(के रूप में वर्तमान या पूर्व में ),हिमालय की चोटी पर विजय प्राप्त कर भारतीय ध्वज फहराने  वाली,ऑटो रिक्शा से लेकर वायुयान तक उड़ाने वाली,घर,खेत खलिहानों ,में,,प्रबंधन ,चिकित्सा,तकनीक,अन्तरिक्ष आदि क्षेत्रों में अग्रणी तथा , मेहनत -मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण करने वाली बहादुर परिश्रमी महिलाओं से सम्पन्न भारत में नारी के विविध रूपों में दर्शन होते हैं.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में  यदि वैधानिक दृष्टि से भी  विचार करें तो क़ानून की दृष्टि ने भी समानता प्रदान करते हुए नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किये हैं.पिता की संपत्ति में समान अधिकार,एक पत्नी के रह्ते हुए पति को दूसरी पत्नी की अनुमति नहीं,दहेज  की मांग करना अपराध है,स्त्री को बेचना,अनैतिक कार्यों के लिए बाध्य करना दंडनीय है,उसको समान शिक्षा,रोजगार का अधिकार दिया गया है,कहीं पति के समान और कहीं उससे भी अधिक वेतन प्राप्त कर वो प्रसन्न  तो है.पति या ससुराल के अन्य सदस्यों द्वारा प्रताडित करने पर तलाक ले सकती है,आवेदन पत्र में माता का नाम लिखना आवश्यक नियम है,वृद्धाओं  दर दर की ठोकरें खाने से बचाने के  लिए राज्य का संरक्षण भी मिलता है.बेटियों की पढ़ाई निशुल्क है स्नातक स्तर पर (कुछ राज्यों में)
ये एक सुखद ,सुन्दर चित्र है,इसके सर्वथा विपरीत वास्तविकता इससे कोसों दूर है. जिसमें कहीं  आज नारी बाजारवाद की शिकार है और भ्रमित हो अनचाही दौड़ का हिस्सा बन रही है,कहीं पुरुष की कुत्सित दृष्टि और कुकर्मों  से पीड़ित होते हुए दिन- रात ,घर-बाहर,कार्यालय,यात्रा के समय ,सबके सामने ,अकेले में बलात्कारियों से पीड़ित है.यहाँ तक कि अबोध बच्चियां को भी नहीं बख्शा जा रहा है,पिता ,बाबा,भाई सभी रिश्ते  तार तार हो रहे हैं  .वेश्यावृत्ति नित नवीन रूपों में समाज में विद्यमान है. समाज का संतुलन बिगड रहा है क्योंकि कन्या भ्रूण हत्या पर रोक नहीं लग सकी है,अशिक्षा के दंश से मुक्ति नहीं मिली है. .सुबह से शाम तक घरेलू ,वाह्य मोर्चों को सम्भालते हुए भी अपने छोटे परिवार को एक सूत्र में नहीं बाँध पा रही है नारी.भरपूर स्वतंत्रता का उपभोग करते हुए भी परिवार टूट रहे हैं. तलाक की दर बढ़ रही है, स्वयम वह गंभीर रोगों का शिकार बनकर अपने मानसिक ,शारीरिक स्वास्थ्य को चौपट कर रही है,उसके  बच्चे हिंसा,तनाव का शिकार बनकर नशे के अंधे कूप में छलांग लगा रहे हैं .परिवारों में परस्पर अविश्वास बढ़ रहा है.सम्पन्न होते हुए भी कुंठा की शिकार बन रही है नारी.आज समाज और स्वयम नारी भी दिखावे की गिरफ्त में है .वृद्धाएं भी दर दर की ठोकरें खाने को विवश हैं अर्थात किसी भी स्थिति में नारी वो सब हासिल नहीं कर सकी है जिसकी वो अधिकारिणी है .जीवन के हर स्टेज पर विडंबनाएं उसका पीछा नहीं छोड़ रही हैं.आज समाज और नारी दिखावे के जाल में फंसे हैं.
दिखावा दिखावा और दिखावा ,चाहे वो प्रेम का हो ,चाहे वो ममता का ,चाहे स्टेटस का हो या शारीरिक सौंदर्य का ,और इस सबमें खो रहा है वो सब कुछ जो उसने पाकर भी खो दिया है.आज बलात्कार एक फैशन बन रहा है,आधुनिकतम ऐश्वर्य -वैभव के साधनों ने एक होड सी पैदा कर दी  है विलासिता की ओर बढते कदम बच्चों को संस्कारित नहीं कर पा रहे हैं i love you  बेटा कहकर बच्चों को भी दिखावे की ओर धकेल दिया है और बच्चे !  वो भी बस love you too mom कहकर अपने को नई दुनिया का समझते हैं और मा भी खिल जाती हैं  ,मातापिता आज बच्चों को उनका आदर्श कैटरीना,करीना ,अक्षय कुमार,सलमान ,शाहरुख मानना सिखा  रहे हैं,भौंडे ,अश्लील गीतों पर अश्लील भावभंगिमाओं के साथ नृत्य करवाना,मिमिक्री सिखाना  आधुनिकता की पहिचान बन रहा है.
आधुनिक शहरी नारी की स्थिति पर विचार कर ग्रामीण नारी की विडंबनाएं इससे सर्वथा भिन्न हैं शिक्षा से वो वंछित है,चौके चूल्हे  ,खेत खलिहान ,इन्ही में उसकी जिंदगी बीत रही है,परिवार ,समाज या राष्ट्र निर्माण में उसकी शक्तियों का सदुपयोग कैसे हो? इस वर्ग का महत्व समझते हुए इनकी  जागृति  के लिए सकारात्मक शिक्षा ही कारगर हो सकती है साथ ही उनके कल्याण के लिए जो योजनाएं लागू की जाती हैं वो तभी सार्थक हैं जब उसका लाभ उन तक पहुंचे.देश के लिए समान रूप से क़ानून लागू हो .
सदा की भांति इस सब अव्यवस्था ,उठापटक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए दोषी समाज और स्वयम को श्रेष्ठ मानने वाला दम्भी  पुरुष तो  है परन्तु वो नारी जो परिवार की धुरी है ,जो रसोई,घर,आर्थिक मोर्चा ,रिश्ते नाते सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए परिवार को बनाती थी , संस्कारों से सम्पन्न बनाने वाली थी ,उस  परिवार को  जो आधार होता था एक  समृद्ध समाज और राष्ट्र का ,वो  भटक गई है ,खोगई है झूठी चमक दमक और तथाकथित आधुनिकता की दौड़ में ,अब उसके लिए परिवार का अर्थ बस अर्थ और काम ही बनता  जा रहा है.यही कारण है कि सक्रियता तो उसकी पहले से कई गुना बढ़ी है ,क्योंकि आज अन्य मोर्चों के साथ वो धनोपार्जन के मोर्चे पर भी डटी हुई है,अहर्निश परिश्रम करने के कारण उसको अपने अधिकारों की सुरक्षा और उपभोग की फुर्सत ही नहीं है.अतः न तो वह अपने पारिवारिक अधिकारों का उपभोग कर पा रही है,न सामाजिक और न ही राजनैतिक .यहाँ तक कि ग्राम पंचायतों या अन्य क्षेत्रों में जहाँ उसके स्थान सुरक्षित हैं और वो पहुँच भी गई ,उनका उपभोग भी उनके नाम पर पुरुष ही कर रहे हैं और वो केवल मुहर लगाती है और  हस्ताक्षर करती है.
oneहर क्षेत्र में नारी श्रेष्ठ है ,क्षमताएं भी  अद्भुत रूप से प्रकृति ने उसको प्रदान की हैं,सृजन की क्षमता तो केवल नारी में ही है नारी शक्ति पुंज है ,परन्तु दुर्भाग्य से प्रकृति द्वारा प्रदत्त यही उपहार उसको कमजोर बना रहा है जब समाज के भेडिये उसका शोषण करते हैं.नारी अपने अधिकारों का सदुपयोग तभी कर सकती है जब वह कर्तव्य और अधिकार में संतुलन बनाये ,पुरुष से प्रतिद्वन्दिता न करते हुए अपनी क्षमताओं का सदुपयोग करे ,पहले स्वयम अपनी शक्ति पहिचाने , आज वो शिक्षित है उसको दीन दुनिया की खबर तो है पर मृगमरीचिका की भटकन उसको सकारात्मक राह पर चलने में बाधक बन रही है अपनी चिंता करे क्योंकि वही परिवार की धुरी है,जिन गुणों ,क्षमताओं  के कारण उसको श्रेष्टतम  कृति माना जाता है उनके साथ अपनी प्रतिभा का विकास करे .नारी को ये भी सुनिश्चित करना होगा कि अधिकार केवल याचना से नहीं मिलते,क्योंकि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी कौन मारेगा उनके अधिकार उनको देकर ,अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी  ,दिखावे की अंधी गलियों से बाहर निकल कर ही उसकी क्षमताओं का लाभ उसको मिल सकता है. मा के रूप में नारी ही परिवार को सही दिशा दे सकती है .साथ ही समाज को भी ये समझना होगा कि नारी ही वह इकाई है ,जिसके जागरण से   ही परिवार का उत्थान सम्भव है और तभी  भारत सभी क्षेत्रों में एक शक्तिसम्पन्न  राष्ट्र बन सकेगा.